किशोर साहू
बालोद, छत्तीसगढ़। छत्तीसगढ़ की धरती पर आस्था और लोकविश्वास की ऐसी अनेक कहानियां हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों की जुबान पर कायम हैं। इन्हीं में से एक है बालोद जिले के झलमला गांव स्थित प्रसिद्ध गंगा मइया मंदिर की कथा। करीब 130 साल पुरानी बताई जाने वाली इस धार्मिक मान्यता के केंद्र में है एक पाषाण प्रतिमा, जो कथाओं के अनुसार तालाब में मछली पकड़ने के दौरान सामने आई थी। आज यही स्थान हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है।
नवरात्र के पावन अवसर पर जब चारों ओर माता की भक्ति की धूम है, तब झलमला का गंगा मइया धाम भी श्रद्धा, पूजा-अर्चना और मनोकामना ज्योति कलशों की रोशनी से विशेष आकर्षण का केंद्र बन जाता है। आखिर कैसे एक तालाब में मिली प्रतिमा के साथ जुड़ी लोककथा ने एक भव्य मंदिर का रूप ले लिया? आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक धाम से जुड़ी मान्यताओं की दिलचस्प कहानी।
जाल में मछली नहीं, मिली माता की प्रतिमा!
कहानी करीब 130 साल पुरानी बताई जाती है। झलमला गांव के पास स्थित बांधा तालाब में एक दिन ग्राम सिवनी का एक मछुआरा मछली पकड़ने पहुंचा। उसने तालाब में जाल डाला, लेकिन जाल किसी भारी वस्तु में उलझ गया।
मछुआरे ने जब जाल खींचा, तो उसमें मछली के बजाय एक पाषाण प्रतिमा मिली। शुरुआत में उसने इसे सामान्य पत्थर समझा और वापस पानी में डाल दिया। इसके बाद उसने दूसरी जगह जाल फेंका, लेकिन कथाओं के अनुसार हर बार जाल उसी प्रतिमा में उलझ जाता था।
बार-बार ऐसा होने से परेशान मछुआरा आखिरकार बिना मछली पकड़े घर लौट गया। लेकिन तालाब में बार-बार उसी प्रतिमा का मिलना आगे चलकर इस क्षेत्र की धार्मिक आस्था से जुड़ी एक चर्चित कथा बन गया।
बैगा को स्वप्न में हुए माता के दर्शन!
इस कहानी का सबसे रोचक मोड़ इसके अगले प्रसंग में आता है। स्थानीय लोकमान्यता के अनुसार, उसी रात गांव के एक गोंड बैगा को स्वप्न में माता के दर्शन हुए। मान्यता है कि माता ने उन्हें जल में अपनी उपस्थिति होने और प्रतिमा को बाहर निकालकर स्थापित कराने का संदेश दिया।
अगली सुबह बैगा ने गांव के मालगुजार छवि प्रसाद तिवारी और अन्य ग्रामीणों को अपने स्वप्न के बारे में बताया। इसके बाद ग्रामीण तालाब पहुंचे और मछुआरे की मदद से प्रतिमा को बाहर निकालने का प्रयास किया।
लोककथा के अनुसार, जाल में फिर वही प्रतिमा मिली। जल से प्रतिमा के प्रकट होने की इस मान्यता के कारण इसे गंगा मइया के नाम से पूजा जाने लगा। शुरुआत में माता की प्रतिमा को छोटी-सी झोपड़ी में स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती थी। समय के साथ श्रद्धालुओं की आस्था बढ़ती गई और यह स्थान एक प्रसिद्ध धार्मिक धाम के रूप में विकसित हुआ।
अंग्रेज अधिकारी ने हटानी चाही प्रतिमा? जुड़ा है यह किस्सा
गंगा मइया मंदिर से जुड़ी एक अन्य चर्चित लोककथा ब्रिटिश शासनकाल की भी है। कहा जाता है कि तांदुला नहर के निर्माण के दौरान अंग्रेज अधिकारी एडम स्मिथ को इस प्रतिमा के बारे में जानकारी मिली थी।
स्थानीय मान्यताओं में यह प्रसंग भी सुनाया जाता है कि प्रतिमा को हटाने की कोशिश की गई, लेकिन कथित तौर पर कुछ अप्रत्याशित घटनाओं के बाद इस प्रयास को आगे नहीं बढ़ाया गया। हालांकि, इस घटना से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेजों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। यही वजह है कि यह प्रसंग आज भी मंदिर की लोककथाओं में विशेष स्थान रखता है।
छोटी-सी झोपड़ी से भव्य मंदिर तक का सफर
जिस स्थान पर कभी छोटी-सी झोपड़ी में माता की पूजा की जाती थी, आज वहां श्रद्धालुओं की गहरी आस्था से जुड़ा भव्य मंदिर स्थापित है। गंगा मइया मंदिर केवल बालोद जिले ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले भक्तों के लिए भी महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है।
नवरात्र के दौरान यहां भक्तों की आवाजाही बढ़ जाती है। श्रद्धालु माता के दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए ज्योति कलश प्रज्ज्वलित करवाते हैं।
चैत्र और शारदीय नवरात्र के अवसर पर गंगा मइया मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। मनोकामना ज्योति कलशों की जगमगाहट मंदिर परिसर को भक्ति और श्रद्धा के रंग में रंग देती है।
नवरात्र के इन नौ दिनों में दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। कई भक्त पैदल यात्रा कर भी मंदिर आते हैं। मंदिर परिसर में गूंजते माता के जयकारे और पूजा-अर्चना का माहौल इस धाम की धार्मिक महत्ता को और बढ़ा देता है।
गंगा मइया मंदिर की विशेषता केवल इसकी प्राचीनता या भव्यता नहीं है। इसकी पहचान उस लोककथा, जनविश्वास और पीढ़ियों से चली आ रही आस्था से भी जुड़ी है, जिसने एक स्थान को हजारों लोगों के लिए श्रद्धा का केंद्र बना दिया।
नवरात्र के अवसर पर यह धाम याद दिलाता है कि धार्मिक स्थलों की पहचान केवल उनकी इमारतों से नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी मान्यताओं, परंपराओं और लोगों की भावनाओं से भी बनती है।
बालोद के झलमला स्थित गंगा मइया मंदिर की यह कहानी आस्था, परंपरा और लोकविश्वास का ऐसा संगम है, जो आज भी श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। करीब 130 साल पुरानी बताई जाने वाली इस कथा के साथ माता के दरबार में हर नवरात्र भक्तों की श्रद्धा उमड़ती है।
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