राहुल ठाकुर
मैनपुर/गरियाबंद: एक ओर सरकार वनांचल क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का जाल बिछाने और समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुँचाने का ढिंढोरा पीटती है, तो दूसरी ओर ज़मीनी हकीकत इन खोखले दावों का जनाज़ा निकालती नज़र आती है। गरियाबंद ज़िले के मैनपुर क्षेत्र से आई बदहाली की तस्वीर ने एक बार फिर स्थानीय प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और जनप्रतिनिधियों की संवेदनहीनता को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
क्या है पूरा मामला?
बेहराडीह निवासी विशेष संरक्षित कमार जनजाति के बुजुर्ग सुमेर सिंह पिछले पाँच दिनों से लापता थे। परिजनों और ग्रामीणों द्वारा काफी खोजबीन के बाद उनका शव बरदुला के जंगलों में एक पेड़ से लटका मिला। घटना की सूचना के बाद पुलिस की मौजूदगी में शव को पोस्टमार्टम के लिए लाया गया।
असली यातना तो पोस्टमार्टम के बाद शुरू हुई। अपनों को खोने के गम में डूबे परिजन 3 घंटे से अधिक समय तक शव वाहन (मुक्ति वाहन) और एम्बुलेंस के लिए गुहार लगाते रहे। लेकिन संवेदनहीन विभाग और लाचार सिस्टम के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। अंततः हताश और मजबूर होकर परिजनों ने बांस की बल्ली का सहारा लिया और शव को कपड़े में बांधकर अपने कंधों पर लादकर गाँव तक पहुँचाया।
स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन से सीधे 5 तीखे सवाल:
- कागजों में दौड़ती गाड़ियाँ, ज़मीन पर क्यों नदारद? सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और ज़िला अस्पताल के खाते में 108, 102 एम्बुलेंस और ‘मुक्ति वाहन’ की गाड़ियाँ कागजों में लगातार दौड़ रही हैं। फिर 3 घंटे तक गुहार लगाने के बाद भी वनांचल के आदिवासियों को एक शव वाहन क्यों नसीब नहीं हुआ?
- विशेष संरक्षित जनजाति के लिए यही है संवेदना? सरकार कमार जनजाति के विकास और संरक्षण के लिए करोड़ों रुपये का बजट आवंटित करती है। क्या प्रशासन की यही नैतिक ज़िम्मेदारी है कि उनके बुजुर्ग का शव पोस्टमार्टम के बाद डंडे पर टांगकर ले जाया जाए?
- अधिकारियों की जवाबदेही तय क्यों नहीं होती? ऐसे मामलों में हर बार केवल ‘जांच के आदेश’ देकर मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है। इस घोर लापरवाही के लिए ज़िम्मेदार स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारी (BMOH/CMHO) और प्रशासन पर सीधी कार्रवाई कब होगी?
- वनांचल क्षेत्रों के साथ सौतेला व्यवहार क्यों? शहरी क्षेत्रों में प्रचार-प्रसार के लिए गाड़ियाँ तुरंत उपलब्ध करा दी जाती हैं, लेकिन दूरस्थ और वनांचल क्षेत्रों के गरीब ग्रामीणों को मूलभूत सुविधाओं के लिए भी तरसना पड़ता है। यह भेदभाव कब खत्म होगा?
- बजट का भारी-भरकम खेल, सुविधा शून्य क्यों? स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये का बजट ठिकाने लगाया जाता है। जब इमरजेंसी में आम जनता और गरीबों को गाड़ी तक नहीं मिल सकती, तो यह बजट किसकी जेब में जा रहा है?
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